भक्त यहां क्यों आते हैं
श्री भ्रामराम्बा देवी की पूजा आंध्र प्रदेश के नंद्याल जिले के श्रीशैलम में होती है। यह मंदिर उसी परिसर में है जहां मल्लिकार्जुन विराजते हैं, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं। देवस्थानम उनके मंदिर को 18 महाशक्तिपीठों में छठा मानता है। उनका नाम भ्रमर से आया है, जिसका अर्थ है मधुमक्खी।
श्रीशैलम में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में शिव और भ्रामराम्बा देवी के रूप में शक्ति एक ही मंदिर परिसर में विराजते हैं। देवस्थानम के अनुसार इसी कारण भक्त श्रीशैलम को शिव और पार्वती, दोनों के लिए अत्यंत प्रिय मानते हैं। पुराण इसे भूकैलासम कहते हैं, यानी धरती पर कैलास। इसे शक्तिपीठों में गिना जाता है, और परंपरा मानती है कि सती की गर्दन यहीं गिरी थी।
भ्रमरी का अर्थ है वह जो मधुमक्खी जैसी है। देवी भागवत पुराण में अरुणासुर की कथा है, जिसे ब्रह्मा ने वरदान दिया था। उसे न कोई हथियार मार सकता था, न कोई पुरुष या स्त्री, और न दो या चार पैरों वाला कोई प्राणी। जब उसने स्वर्ग पर कब्जा किया, तब देवी भ्रमरी के रूप में प्रकट हुईं और असंख्य काली मधुमक्खियां छोड़ीं, जिन्होंने उसे और उसकी सेना को नष्ट कर दिया। देवस्थानम उन्हें अरुणासुर संहारी कहता है, और उन्हें दुर्गा सप्तशती में स्तुति की गई अंतिम शक्ति भ्रमरी से जोड़ता है।
आदि शंकराचार्य श्रीशैलम आए थे, और देवस्थानम कहता है कि उन्होंने यहीं सौंदर्य लहरी लिखी। उनके स्थापित किए श्री चक्र को भ्रामराम्बा देवी के मंदिर में रखा गया है, जहां देवी को कुमकुमार्चन अर्पित किया जाता है।

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