भक्त यहां क्यों आते हैं
तारापीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले का एक छोटा मंदिर नगर है। यहां का तांत्रिक मंदिर देवी तारा को समर्पित है, और उसके पास बना श्मशान भी प्रसिद्ध है।
तारापीठ बीरभूम जिले में रामपुरहाट कस्बे के पास, द्वारका नदी के किनारे, सहापुर ग्राम पंचायत का एक गांव है। यह मंदिर देवी तारा का तांत्रिक हिंदू तीर्थ है, और इसमें मां तारा की मूर्ति स्थापित है। हर दिन हज़ारों श्रद्धालु यहां आते हैं।
कथा है कि सती की तीसरी आंख इसी स्थान पर गिरी थी, इसलिए यह उन 52 शक्तिपीठों में से एक है, जहां सती के शरीर के अंग गिरे थे। एक और स्थानीय कथा बताती है कि देवी तारा ने शिव को कष्ट से कैसे बचाया। मूर्ति में वे दो सांपों को थामे हुए दिखती हैं, और शिव उनकी गोद में हैं। दिन में मूर्ति पर सोने का मुखौटा रहता है, जिसे रात में हटाया जाता है।
मुख्य मंदिर संगमरमर और टेराकोटा से बना एक छोटा मंदिर है, जिसकी घुमावदार छत को दोचाला कहते हैं। गर्भगृह में तारा की दो मूर्तियां हैं। मंदिर को 13वीं सदी का तीर्थ बताया गया है। तांत्रिक संत बामाखेपा इस मंदिर में पूजा करते थे और श्मशान में रहते थे।

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